Thursday, 2 April 2026

Story

अधूरी आहट

रवि एक छोटे से गाँव में नया-नया आया था। उसे स्कूल में नौकरी मिली थी, इसलिए उसने गाँव के किनारे एक पुराना मकान किराए पर ले लिया। मकान सस्ता था… बहुत सस्ता। गाँव वालों ने उसे कई बार मना किया—

“वहाँ मत रहो… वो घर ठीक नहीं है।”

लेकिन रवि हँस दिया—
“भूत-प्रेत कुछ नहीं होते।”

पहली रात सब ठीक था। दूसरी रात भी।
लेकिन तीसरी रात…

रात के लगभग 2 बजे, अचानक उसे ठक… ठक… ठक की आवाज़ सुनाई दी। जैसे कोई दरवाज़े पर दस्तक दे रहा हो।

रवि उठा, दरवाज़ा खोला…
बाहर कोई नहीं था।

उसने सोचा शायद हवा होगी।

जैसे ही वह वापस बिस्तर पर गया, फिर वही आवाज़—
ठक… ठक… ठक…

इस बार आवाज़ दरवाज़े से नहीं… कमरे के अंदर से आ रही थी।

रवि का दिल तेज़ धड़कने लगा। उसने धीरे-धीरे मुड़कर देखा…

कमरे के कोने में एक पुरानी अलमारी थी। आवाज़ वहीं से आ रही थी।

वह हिम्मत करके अलमारी के पास गया… और दरवाज़ा खोल दिया।

अंदर कुछ नहीं था।

रवि ने राहत की साँस ली और वापस मुड़ने लगा… तभी उसे अपने पीछे किसी के साँस लेने की आवाज़ सुनाई दी।

वह धीरे-धीरे पलटा…

अलमारी के अंदर… अब एक लड़की खड़ी थी।

सफेद कपड़े, लंबे बाल, और आँखें… पूरी तरह काली।

वह मुस्कुराई।

“तुम… मुझे देख सकते हो?”

रवि डर के मारे कुछ बोल नहीं पाया।

लड़की धीरे-धीरे अलमारी से बाहर आई… लेकिन उसके पैर ज़मीन को छू नहीं रहे थे।

“पिछले लोग मुझे नहीं देख पाते थे… इसलिए मैं उन्हें मार देती थी।”

रवि पीछे हटने लगा।

“लेकिन तुम… तुम तो मुझे देख सकते हो…”
उसने धीमे से कहा, “अब तुम मेरे साथ रहोगे… हमेशा।”

अचानक लाइट बंद हो गई।

कमरे में अँधेरा छा गया।

और फिर…
एक जोरदार चीख सुनाई दी।

अगली सुबह, गाँव वाले उस घर के पास गए।

दरवाज़ा खुला था।

अंदर… कोई नहीं था।

बस अलमारी बंद थी…

और अंदर से हल्की-हल्की आवाज़ आ रही थी—
ठक… ठक… ठक…

अगर कभी रात को तुम्हें भी ऐसी आवाज़ सुनाई दे…
तो दरवाज़ा मत खोलना।

क्योंकि…
हर बार बाहर कोई नहीं होता। 

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