आईना
सोनू अपने परिवार के साथ नए घर में रहने आया। घर बहुत सुंदर था, लेकिन एक कमरे में एक पुराना बड़ा आईना लगा हुआ था।
माँ ने कहा,
“इस कमरे में ज्यादा मत जाना।”
सोनू ने पूछा, “क्यों?”
माँ ने बस इतना कहा, “बस… मत जाना।”
लेकिन सोनू बहुत जिज्ञासु था।
एक दिन दोपहर में वह चुपके से उस कमरे में गया। कमरे में सन्नाटा था। उसने आईने के सामने खड़े होकर खुद को देखा।
सब कुछ सामान्य था।
वह हँसने लगा… और अचानक उसे लगा कि आईने में उसका चेहरा थोड़ा अजीब लग रहा है।
आईने में उसका प्रतिबिंब… **मुस्कुरा रहा था**।
लेकिन सोनू… मुस्कुरा नहीं रहा था।
वह डर गया।
उसने अपना चेहरा सीधा किया… लेकिन आईने में उसका चेहरा अभी भी मुस्कुरा रहा था।
“ये… ये क्या है?”
अचानक आईने के अंदर वाले सोनू ने धीरे से हाथ उठाया… और काँच के अंदर से बाहर आने की कोशिश करने लगा।
सोनू पीछे हट गया।
आईने में से आवाज़ आई—
“तुम बाहर… मैं अंदर… अब बदलते हैं।”
इतना सुनते ही सोनू भागने लगा, लेकिन दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
उसने पीछे मुड़कर देखा…
आईने वाला सोनू अब पूरी तरह बाहर आ चुका था।
और असली सोनू…
धीरे-धीरे आईने के अंदर खिंचता जा रहा था।
वह चिल्लाया— “माँ!!”
लेकिन आवाज़ बाहर नहीं गई।
---
शाम को माँ ने कमरे का दरवाज़ा खोला।
सोनू बाहर खड़ा था… शांत, बिना कुछ बोले।
माँ ने पूछा, “तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”
सोनू मुस्कुराया…
लेकिन उसकी मुस्कान… बिल्कुल वैसी ही थी…
जैसी आईने में दिखती है। 😈
अगर कभी आईने में अपना चेहरा
अलग दिखे…
तो तुरंत वहाँ से हट जाना…
क्योंकि… हर बार वो तुम नहीं होते।
No comments:
Post a Comment
Thanks for your valuable comments.